*बिजावर विधानसभा के झमटुली गांव के आदिवासी भोजन को तरस रहे*
*गरीबों को न राशन मिला, न मिल रहा काम*
छतरपुर। सरकार भले ही यह कहती हो कि प्रवासी मजदूरों को रोजगार देने के समुचित उपाय किए गए हैं लेकिन हकीकत कुछ और है। ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंचे मजदूर काम के लिए तरस रहे हैं। इतना ही नहीं उन्हें भोजन भी नसीब नहीं हो रहा। कई ऐसे आदिवासी हैं जो दिन में सिर्फ एक वक्त के भोजन पर जीवन-यापन कर रहे हैं।
राजनगर जनपद पंचायत की ग्राम पंचायत झमटुली के आदिवासियों का दर्द सुनकर कोई भी आहत हो सकता है। यहां के आदिवासी महानगरों से बीमारी से बचने के लिए अपने घर तो आ गए लेकिन यहां वे हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। इतना ही नहीं अब उनका राशन भी खत्म हो चुका है जिससे वे भूखे पेट जीने को भी मजबूर हैं। कल्याणी तीजाबाई आदिवासी ने बताया कि तीन माह पहले उन्हें राशन मिला था। परिवार में 6 लोग हैं, राशन खत्म हो चुका है। ऐसी स्थिति में कभी खाना खा लिया तो कभी भूखे पेट ही सो जाते हैं। वहीं लखन आदिवासी का कहना है कि जबसे बाहर से आए हैं तबसे खाली पेट बैठे हैं। राममिलन आदिवासी, नोनेलाल आदिवासी, गंसीबाई, हक्कू अहिरवार सहित आधा सैकड़ा से ज्यादा ऐसे गरीब हैं जो दो वक्त की रोटी के संकट से जूझ रहे हैं। गरीबों का कहना है कि वोट लेने के लिए नेता उनके दरवाजों पर बार-बार आते हैं लेकिन जब उन पर विपत्ति आई है तो कोई हाल जानने भी नहीं आ रहा।
दिव्यांग दम्पत्ति का जीवन भीख पर निर्भर
झमटुली के रहने वाले भगोले आदिवासी नेत्रहीन हैं और उनकी पत्नि दिव्यांग हैं। दोनों एक दूसरे का सहारा बनकर काम करते हैं। चूंकि उनकी कोई संतान नहीं है इसलिए वे गांव में ही लोगों से भीख मांगकर अपना पेट भरते हैं। भगोले आदिवासी ने बताया कि उसे अब तक कोई सुविधा नहीं मिली। गांव के लोग जो भी सामग्री देते हैं उसी से पेट भरते हैं।
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